आज प्रस्तुत है मेरी एक नई रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

वापस कब जाओगे बादल
रस्ता भूल गए।
जहाँ ज़रूरत नहीं रही अब
अटके हो ग़ोवा में
बुला रही रजधानी उलझी है
विष भरी हवा में,
कैसे लानी है मौसम में
समता भूल गए।
कुछ तो अनुशासन सीखो तुम
बादल मेरे भाई,
कहीं बरसते बे मौसम पर
कहीं बूंद न आई
यूं मत बनो कसाई भैया
ममता भूल गए।
बहुत बड़ी आवश्यकता है
रखना सदा संतुलन
क्या अच्छा लगता है तुमको
दायित्वों से विचलन
करनी दूर जहां हो सके
विषमता भूल गए।
पहली बात नहीं भूलो तुम
समय सारिणी अपनी,
फिर लोगों के कष्ट देख
दे दो उनको राहत भी,
कब से करते आए हो यह
धंधा भूल गए।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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