है किताब-ए-ज़िंदगी!

अव्वल-ओ-आख़िर के कुछ औराक़ मिलते ही नहीं,
है किताब-ए-ज़िंदगी बे-इब्तिदा बे-इंतिहा|

कृष्ण बिहारी नूर

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