उड़ा कर ले गई!

उड़ा कर ले गई बाद-ए-ख़िज़ाँ* इस साल उस को भी,
रहा था एक बर्ग-ए-ज़र्द बाक़ी मेरे गुलशन में|
*पतझड की हवा
चकबस्त बृज नारायण

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