आज प्रस्तुत है एक नवगीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

साथ में अपने महज़ पागल हवाएं थीं
दूर आंखें मिचमिचाती सी दिशाएं थीं।
दिग्विजय का स्वप्न भी हमने नहीं पाला
यात्रा को बस हमारा स्वत्व दे डाला
रहे चलते मान यह कर्तव्य है अपना
है कहीं मंज़िल, वहम भी यह नहीं पाला,
साथ में कुछ धारणाएं, कुछ दुआएं थीं।
बैठते कुछ पल कहीं फिर उठ खड़े होते
जलाशय मिलता कहीं तो हाथ-मुंह धोते
देखते सामान सारा साथ है अपने
ठोस धरती पर कदम, किंचित नहीं सपने,
राह थी, कुछ प्रेरणा, कुछ वर्जनाएं थीं।
सोचते यह भी रहे, क्यों जा रहे हैं हम,
किसी मंज़िल से निकटता पा रहे हैं हम
किसलिए हैं हम चले, गंतव्य क्या अपना
अंततः क्या प्राप्त करने जा रहे हैं हम,
बहुत संशय तनिक सी संभावानाएं थीं।
बैठ रहना तो नहीं था साध्य भी अपना
बारिशें सहना चिलकती धूप में तपना
प्राप्य जो भी हो मगर चलना निरंतर है
घूमते पहिए सरीखा चलन है अपना,
स्थिर दिखीं जो वे सभी अट्टालिकाएं थीं।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार ।
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