ज़ख़्मी इंसाँ ज़ख़्मी!

ज़ख़्मी सरहद ज़ख़्मी क़ौमें ज़ख़्मी इंसाँ ज़ख़्मी मुल्क,
हर्फ़-ए-हक़ की सलीब उठाए कोई मसीह तो आए अब|

अली सरदार जाफ़री

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