सोच रहे हैं मुद्दत से!

हम सोच रहे हैं मुद्दत से अब उम्र गुज़ारें भी तो कहाँ,
सहरा में ख़ुशी के फूल नहीं शहरों में ग़मों के साये हैं।

सुदर्शन फ़ाकिर

Leave a comment