ऐसे भी ज़माने आये हैं!

होठों पे तबस्सुम हल्क़ा सा आँखों में नमी सी है ‘फ़ाकिर’
हम अहले-मोहब्बत पर अक्सर ऐसे भी ज़माने आये हैं।

सुदर्शन फ़ाकिर

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