झूम रहीं बालियां!

आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि और कुशल मंच संचालक श्री अशोक चक्रधर जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।

चक्रधर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक चक्रधर जी की यह कविता –

रे देखो खेतों में झूम रहीं बालियां।
फल और फूलों से,
पटरी के झूलों से
खाय हिचकोले मगन भईं डालियां।
रे देखो खेतों में झूम रहीं बालियां।

ऋतु है बसंती ये
बड़ी रसवंती ये।
कोयलिया कूक रही,
जादू सा फूंक रही।
सखियां हैं चुनमुन है,
पायलों की रुनझुन है।
मस्ती में जवानी है,
अदा मस्तानी है।
चुनरी है गोटे हैं,
झूला है, झोटे हैं।
घंटी बजी ख़तरों की,
टोली आई भंवरों की।
धूल नहीं फांकेंगे,
बगिया में झांकेंगे।
बगिया में तितली है,
अरे ये तो इकली है।
नहीं नहीं और भी हैं,
अमियां पे बौर भी हैं।
तितली के नख़रे हैं,
भंवरे ये अखरे हैं।
भंवरे ने मुंह खोला,
सखियों से यों बोला—

हम भए जीजा कि तुम भईं सालियां।
रे देखो खेतों में झूम रहीं बालियां।

बगिया में रास रचा,
बड़ा हड़कम्प मचा।
सुध-बुध भूला जी,
थम गया झूला जी।
कैसे घुस आए हो,
किसने बुलाए हो ?
हम नहीं मानें जी,
तुम्हें नहीं जानें जी !
काले हो कलूटे हो,
तुम सब झूठे हो।
मुंह धो के आ जाओ,
तितली को पा जाओ।

भंवरों की टोली ये,
सखियों से बोली ये—
कान्हा भी तो कारे थे,
मुरलिया वारे थे।
हम न अकेले हैं,
ख़ूब खाए-खेले हैं।
मुरली बजाएंगे,
सबको ले जाएंगे।
सब हैं तुम्हारे जी !
शरम के मारे जी,
सखियों के गालों पर छा गईं लालियां।
रे देखो खेतों में झूम रहीं बालियां।


रे देखो खेतों में झूम रहीं बालियां।
फल और फूलों से,
पटरी से झूलों से
खाय हिचकोले मगन भईं डालियां।
रे देखो खेतों में झूम रहीं बालियां।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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6 responses to “झूम रहीं बालियां!”

  1. जीवन और रंगों से भरपूर एक कविता। यह प्रकृति के आनंद और वसंत की ताज़गी को बहुत ही उत्सवपूर्ण और मनमोहक तरीके से व्यक्त करती है।

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी

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  2. सुंदर कविता।

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    1. धन्यवाद जी

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  3. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

      Liked by 1 person

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