कब तक रहें देखते एल्बम!

आज प्रस्तुत है एक नवगीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-


कब तक रहें देखते एल्बम!

बदल गया, कुछ बदल रहा है
अब पहले सा कुछ न रहा है,
केवल हल्की सी छाया है
सब कुछ पल-पल छीज रहा है।

हम अब भी मन में पाले हैं
पहले सा होने का मतिभ्रम।

सभी देखते बारी-बारी
समय बली की मीनाकारी
जीवित हैं हाँ यह तो सच है
खेल खिलाता अभी मदारी,


कोई सहज खेलता जाता
किसी को मिली कारा सश्रम।

यह जीवन मेलों-ठेलों का
प्रतिदिन की रेलम-पेलों का,
रोना-गाना, कुछ न बहाना,
लिखी पटकथा उसे निभाना

कब तक फिल्म चलेगी अब यह,
दृश्य बचे लगते हैं अब कम।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार ।


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