चलो कि धूप दरीचों में

उठो कि ओस की बूँदें जगा रही हैं तुम्हें,
चलो कि धूप दरीचों में आ के बैठ गई|

मुनव्वर राना

2 responses to “चलो कि धूप दरीचों में”

  1. बहुत सुंदर।

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    1. धन्यवाद जी

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