हम मन की डोरी खोलेंगे!

आज प्रस्तुत है मेरी एक नई रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-


हम मन की डोरी खोलेंगे।

गांठ बहुत मन की डोरी में
फिर भी यह सुलझी दिखती है
बनी तरल जैसे जल धारा
संवेदन आखर लिखती है,

इसकी भाषा, अपनी भाषा,
इसकी बानी हम बोलेंगे।

यह भावों के नीर नहाई
सभी तीर्थ यूं ही कर आई,
कभी सुमिरिनी यह बन बैठी
तन्मय होकर प्रभु गुन गाई,

जहाँ ले चलेगी, जाएंगे
जिसे कहे, उसके हो लेंगे।

निर्मल हो तो गंगा है यह
उच्छल जलधि तरंगा है यह
हिमगिरि सी उज्ज्वल आभा ले
मधु स्वर की सारंगा है यह

इसमें मैल न घुलने देंगे
कष्ट भले ही हम झेलेंगे।

क्रंदन, हास्य, विलाप, भजन से
सभी काम होते हैं मन से
मन यदि रमे तो सब कुछ चंगा
कोई काम नहीं बेमन से,

सदा साथ यह मन की डोरी
जो हो सहज प्राप्य ले लेंगे।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

********

Leave a comment