प्रस्तुत है मेरी आज की रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

आना-जाना, जाना-आना
आज यहाँ, कल वहाँ ठिकाना।
फिर से लगते बैग-अटैची
टूथ ब्रश, रेजर और कैंची,
मोबाइल, चार्जर न भूलना
लैपटॉप बाहर ही रखना।
घड़ी, बेल्ट के साथ इन्हें भी
एयरपोर्ट पर पड़े दिखाना।
बार-बार रूटीन बदलता
साथ दवा का झोला चलता,
धैर्य सहित तैयारी करना
काम न आएगी चंचलता,
जहाँ गए फिर वहाँ देखना
है किस तरफ टहलने जाना।
भूल गए सामान अहम यदि
वापस भी आना पड़ जाता
या फिर नए ठिकाने जाकर,
बाज़ारों में खोजा जाता।
देश में तो यह चल सकता है
बाहर बहुत कठिन है पाना।
कुछ तो ऐसे हैं दुनिया में
कलाकार हों या व्यापारी,
जिनके बैग-अटैची रखते
हरदम चलने की तैयारी,
कुछ की तो यात्राएं ही हैं
बनी सफलता का पैमाना।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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