हम मन की परतें खोलेंगे।

आज प्रस्तुत है मेरी एक नई रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-


हम मन की परतें खोलेंगे।

हर तह में कुछ भाव भरे हैं
व्यतिक्रम औ ठहराव भरे हैं
रुक रुककर बढ़ने के क्रम में
आए वे भटकाव भरे हैं,

सच की कसम निभाएंगे हम
मन बोला सो हम बोलेंगे।

बर्फ ज्ञान की भले न पिघले
विद्वद्जन कतराकर निकलें,
हम खुलकर अभिव्यक्त करेंगे
भाव हमारे उथले-छिछले

भले शिल्प के धनी नहीं हम
दिल की ही बानी बोलेंगे।

भाव हमारे अपनी पूंजी
इनकी धमक विश्व में गूंजी
किंतु खबर ये नहीं बनेंगे
मन बोलेंगे, मन समझेंगे,

ज्ञानी की यह नहीं संपदा
निश्छल जन बेहतर बोलेंगे।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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