अपनी एक नई रचना आज शेयर कर रहा हूँ, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

कम होती जाती हैं खुशियां
होता जाता दूर निवाला
दोष तराजू में भी है कुछ
कुछ है कुटिल तौलने वाला।
सभी साज़-सामान यहाँ हैं
गीता और क़ुरान यहाँ हैं
पर जिसको मानव कह पाएं
आखिर वो इंसान कहाँ है,
पोथी में उपदेश भरे हैं
झूठा उन्हें बोलने वाला।
साधु-असाधु कौन पहचाने
जो भुगते वह उनको जाने
प्रभुता की खातिर तन जातीं
भद्र जनों में तीर-कमानें,
सबसे अधिक मिला वो शातिर
जो था मधुर बोलने वाला।
संबंधों का मान कहाँ है
सज्जन का सम्मान कहाँ है,
मन में बसती प्रीत नहीं है
झूठी हर पहचान यहाँ है।
इस क्षण जिसे रखा कांधों पर
अगले क्षण धरती पर डाला।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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