मख़मूर नज़र आया!

ज़र्रा हो कि क़तरा हो ख़ुम-ख़ाना-ए-हस्ती में,
मख़मूर नज़र आया सरशार नज़र आया|

फ़िराक़ गोरखपुरी

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