आज प्रस्तुत है मेरी एक नई रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

जीवन कितना बडा अचंभा
छोटे पांव, रास्ता लंबा।
कितनी बार अश्रु छलकाए
बरबस हर्षाए, बौराए
लेकिन यह भी सच है भाई
काफी दूर चले हम आए,
राह दिखाता श्वान कहीं पर
और कहीं बिजली का खंबा।
काम किया, आराम किया है
जब चाहा संग्राम किया है
कभी खुश किया है औरों को
खुद को कभी सलाम किया है,
जैसे कटी और कट जाए,
भली करे माता जगदंबा।
फिरे भटकते मारे-मारे
साथ हमारे चंदा तारे,
बहुत बार समझाया इनको
यूं मत भटको बंधु हमारे
तुम उन्मुक्त गगन के वासी
अलग हमारा गोरख धंधा।
फिक्र करें तो अधिक कठिन है
बेफिक्री में बेहतर दिन है
आखिर चलते तो जाना है
सपनों को रचते जाना है,
सबको हिम्मत दे मेरे प्रभु
हर कोई है तेरा बंदा।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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