बॉलकनी में वृद्धा!

प्रस्तुत है आज की रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

लोग चांद में बैठी देखते हैं
जिस वृद्धा को रात में,
मुझे वह सुबह-सवेरे
सामने की बॉलकनी में
दिखाई देती है।

पता नहीं कब
आ जाती है वहाँ,
कोई मिले
चांद की वृद्धा को
पहचानने वाला
तो पूछूं
क्या ये वही है।

एक कुर्सी रखी है
बॉलकनी में
वहीं आकर बैठ जाती है
सुबह-सवेरे
मोबाइल भी नहीं होता
उसके हाथ में,
बदलती दुनिया को
अपनी ही निगाहों से
देखना चाहती है वह,
जब तक उसका
चांद पर जाने का
समय न आ जाए।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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