प्रस्तुत है आज की रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

वक्त तो हर हाल में
होता सिकंदर है,
पर हमारी प्यास भी
गहरा समंदर है।
हम चले थे साथ लेकर
चमकते पत्थर
मनाते उत्सव चले हम
अगम राहों पर,
दर्द का हमसे रहा
रिश्ता निरंतर है।
कौन सा अब गीत
गाना चाहते हैं हम,
चल दिए पर कहाँ
जाना चाहते हैं हम,
प्रश्न हैं अनिवार
पर कोई न उत्तर है।
कुछ सलीका सीखना
चाहा नहीं हमने
जोखिमों का भार भी
थाहा नहीं हमने
बस हमारे चरण ही
बेहद घुमक्कड हैं।
हम चले हर हाल में हैं
चाल मस्तानी
हार हमने आपदाओं से
नहीं मानी।
खेलते हैं भाग्य से
ऐसे खिलंदर हैं।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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