आज प्रस्तुत है मेरी एक नई रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

गोरे बादल, काले बादल
आफत के परकाले बादल।
कुछ तो हैं जो दिख भर जाते
फिर आगे को हैं बढ जाते
कुछ रूई के फाहों जैसे
कुछ घनघोर गुनाहों जैसे।
कब आते हैं, कब जाते हैं
आवारा, मतवाले बादल।
मन में लिए प्रतीक्षा इनकी
प्यासी धरती खूब तरसती,
कभी कभी ये खूब गरजते
और मूसलाधार बरसते,
तब ये दया न बिल्कुल खाते
आफत लाने वाले बादल।
जल समुद्र से ही ले जाते
अपने मन से फिर निपटाते
कभी मानवों को तरसाते
कभी आस भर हैं सरसाते,
हैं अपनी मर्जी के मालिक
निस्पृह और निराले बादल।
कभी कहर भी हैं बन जाते
जीवन तहस-नहस कर जाते,
चलती तब सडकों पर नैया
बहुत कठिन हो जाता भैया
यही प्रार्थना बने रहो तुम
दया दिखाने वाले बादल।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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