आज प्रस्तुत है एक नवगीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

फिर से देखेंगे हम सपने!
सपनीला कुछ पास नहीं है
दिखती कोई आस नहीं है
किंतु हौसला तो कायम है
बस मन में मधुमास नहीं है।
मदिर कल्पना के ये पंछी
आतुर एक करिश्मा रचने।
सपनों की तो बात निराली,
खूब फुदकते डाली-डाली
चाहे शाखें सूख रही हों
या फिर छाई हो हरियाली,
थोड़ा वातावरण चाहिए
स्वप्न महल रच लेंगे अपने।
सपने हैं तब तक जीवन है
यही भाव, यह उद्दीपन है
कैसा वह मानव हो जाए
जिसका प्रिय सपना खो जाए,
चिंता नहीं हमें खोने की
नित्य नए हमको हैं रचने।
मुझको फिर मज़बूत बना दे
एक नया रस्ता दिखला दे
सपना ही मेरा संबल है
जो यथार्थ को धूल चटा दे,
हम कल्पना जगत के प्राणी
सपने-जीवन, जीवन-सपने।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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