प्रस्तुत है आज की रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

सपनों की अलग ही दुनिया है
निराली, नशीली
भयावह भी होती है कभी!
एक अलग दुनिया है वो
लेकिन उसका आधार
हमारी ज़िंदगी में ही है,
हमारी कामनाएं, हमारे भय
वे ही सृजन करते हैं
हमारे सपनों का।
जैसे सायास हम
रचते हैं कविता,
वैसे ही कामनाओं और आशंकाओं में
उलझा हमारा मन
रचता है सपने
हमारे लिए।
एक रिक्शा चालक
कहाँ का सपना देखेगा,
शायद पहले यही देखे
कि वह रिक्शा में
पीछे बैठकर चल रहा है।
और जो
हवाई यात्रा करता है
जहाँ सुंदर परिचारिकाएं
मुस्कुराकर पूछती हैं
क्या चाहिए-
वह तो स्वर्ग के सपने
देख सकता है ना!
फिलहाल मेरा स्वप्न है कि
आपको यह रचना पसंद आए।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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