आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री सोम ठाकुर जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।
सोम ठाकुर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत-

उजली सुबह के नाम पर
धोखे हमें बेहद मिले
संकल्प कब पर्वत हुए
कब लोग आदमकद मिले
अपराध में डूबे हुए
खुद से बड़े ऊबे हुए
तन से तपे इस देश में
मन से मरे जनपद मिले
इतने बुझे वादे हुए
संघर्ष सब प्यादे हुए
इस मंत्र से जिंदा रहे –
‘शायद मिले, शायद मिले!’
किसकी करे आलोचना
थोथा चना बाजे घना
थी पेट कि वह आग जो
‘गब्बर’ बने ‘अमज़द’ मिले
चितचोर है सोना हिरन
बौना हुआ जो सूर्य मन
दरबार रावण के लगे
लेकिन कहा अंगद मिले
जनतंत्र के ये रोग हैं –
मुख एक, छप्पन भोग हैं
जो लोग हैं धनवंत
जेबो में लिए संसद मिले
अपना अजब घरबार है
दीवार-दर- दीवार है
थी चाह आँगन की मगर
जाले पुरे गुंबद मिले
कीड़े हुए इतनी गुनी-
हर पोर आज़ादी घुनी
बदलाव का लेकर भरम
हम को नये नारद मिले
संयोग ये कैसा बदा
हक में निराला के सदा
थी गंजिया छनती हुई
चिथड़े हुए तहमद मिले
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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