आज प्रस्तुत है एक कविता, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

गीत पड़े हैं
कई अधूरे
अलमारी में
ठोक पीटकर शीघ्र
उन्हे
पूरा करना है।
कहीं कमी है
अनुभव की, संवेदन
नहीं कहीं
किसी गीत की भावभूमि अब
अपनी नहीं रही
जो भी हो, उनके खाली
हिस्सों को भरना है।
इन गीतों को
कुछ विद्वान दूर से निरखेंगे
कुछ अपने पैमानों पर
इनको परखेंगे,
यह सब रखकर ध्यान
मुझे आगे पग धरना है।
उद्घाटित होंगे ये सब भी
अपनी बारी से
जब ये बाहर निकलेंगे
दिल की अलमारी से,
झाड़-पौंछकर तब इनको
आंगन में धरना है।
अपने सुख के लिए
कार्य यह
मैं भी करता हूँ
तुलसी का आदर्श
यथोचित उस पर
चलता हूँ,
संप्रेषण का धर्म
इसी का
पालन करना है।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार ।
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