सूरज किधर गया!

आज प्रस्तुत है एक और रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-


कई दिनों से देख रहा हूँ
सूरज किधर गया,
कहीं राह में खेल रहा है
या अपने घर गया।

बस्ता यहाँ पड़ा दिखता है
मार लगाऊंगा
वापस आ जाए फिर
लंबी क्लास चलाऊंगा

वर्षा का वह बना बहाना
जाने किधर गया।

अच्छा चलन नहीं दिखता है
उसका कुछ दिन से
इधर यहाँ हाजिरी लगाई
उधर गया फुर से

मिलने पर हर बार बहाना
एक नया कर गया।

वैसे शिथिल दिखाई देता
है वह मुझको तो
मौसम का यदि बुरा असर है
मुझसे बोले तो,

मैं कोई हनुमान नहीं हूँ
इतना क्यों डर गया।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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2 responses to “सूरज किधर गया!”

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