अपनी एक नई रचना आज शेयर कर रहा हूँ-

क्षीण होती जा रही जब
आस्थाओं की धुरी हो,
प्रेरणा तो ज़िंदगी देगी,
भली हो या बुरी हो|
हम नदी के बांध से
ज्यादा प्रभावी हैं,
रोकते ही नहीं पानी
सुखा देते हैं,
बीतनी है ज़िंदगी
सुख हो,
भले दुख हो,
मुस्कुराकर ज़िंदगी को
छका देते हैं,
गूंजती ही धुन
सदा मस्तिष्क में रहती,
आत्मचिंतन हो
भले वह बांसुरी हो।
स्वप्न के पीछे
सदा जो भागते रहते,
बहुत संभव उन्हें
पश्चाताप भी होगा,
किंतु यदि कोई
जगत में स्वप्न
देखे ना
सत्य है सहना उसे
संताप ही होगा,
चाह गंगाजल छिडककर
करें पावन सब दिशाएं,
क्या करें तेजाब से
जब भरी
अपनी अंजुरी हो।
भरम हम हैं पालते
रहते हमेशा ज़िंदगी में
सरल पर जीवन
बताओ कब, कहाँ,
किसका हुआ है,
यह छली तो
प्यास रेगिस्तान की
हर आदमी भटका
हुआ है,
टेरना तो हमें होगा
जब तलक हैं
इस धरा पर
गायकी अपनी भले ही
ठीक हो या
बेसुरी हो।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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