तिरे ज़ख़्मों के निशाँ!

ख़ुशनुमा लगते हैं दिल पर तिरे ज़ख़्मों के निशाँ,
बीच दीवार में जिस तरह घड़ी लगती है|

मुनव्वर राना

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