रह-ए-ख़िज़ाँ में!

रह-ए-ख़िज़ाँ में तलाश-ए-बहार करते रहे,
शब-ए-सियह से तलब हुस्न-ए-यार करते रहे|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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