अपना मक़ाम शाख़-ए-बुरीदा* है बाग़ में,
गुल हैं मगर सताए हुए बाग़बाँ के हैं|
*कटी हुई शाखा
चकबस्त बृज नारायण
A sky full of cotton beads like clouds
अपना मक़ाम शाख़-ए-बुरीदा* है बाग़ में,
गुल हैं मगर सताए हुए बाग़बाँ के हैं|
*कटी हुई शाखा
चकबस्त बृज नारायण
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