आज हिंदी के अनूठे कवि स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी के बारे में बात करने का मन हो रहा है, जिन्हे हम भवानी दादा के नाम से भी याद रखते हैं।

मुझे याद है जब मैं दिल्ली में था और मैंने नया-नया ही कविताएं लिखना शुरू किया था तब मै एक गोष्ठी में गया था, जिसमें भवानी दादा मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे, वैसे मैं भवानी दादा को पहले भी बहुत से कवि सम्मेलनों में सुन चुका था लेकिन निकट से और विस्तार में सुनने का यह पहला अवसर था। मैंने और वहाँ उपस्थित अन्य लोगों ने भवानी दादा के कविता पाठ का भरपूर आनंद लिया। इस गोष्ठी में मैंने भी कविता पाठ किया जिसको सुनकर भवानी दादा ने टिप्पणी की ‘आदमी समझदार लगते हो’, मेरे लिए भवानी दादा की यह टिप्पणी एक आशीर्वाद से कम नहीं थी।
वैसे मुझे वरिष्ठ रचनाकारों के निकट बैठने की शुरू से ही आदत नहीं रही है। दिल्ली में कनॉट प्लेस के कॉफी हाउस में अनेक वरिष्ठ साहित्यकार आते थे, जिनमें विष्णु प्रभाकर जी भी शामिल थे, परंतु मैं कभी उनके साथ नहीं बैठा, मुझे लगता था कि उनसे बात करते हुए कहीं अपनी अल्पज्ञता प्रकट न हो जाए, वैसे इसका मुख्य कारण मेरा शर्मीला होना ही था।
मेरे मित्र अश्विनी कुमार गोयल इस मामले में शर्म महसूस नहीं करते थे, मुझे याद है कि उनके साथ मैं कम से कम दो बार निर्मल वर्मा जी के करोल बाग स्थित घर पर गया था, बात करने की पूरी ज़िम्मेदारी अश्विनी जी ने संभाली थी। एक बार तो अश्विनी किसी खास अवसर पर निर्मल वर्मा जी के लिए लड्डू लेकर गए थे, निर्मल जी उस समय तक तो अकेले ही रहते थे, वे हमसे भी लड्डू खाने के लिए बोले, और कहा कि कितना अजीब लगता है न कि कोई व्यक्ति अकेला बैठा हुअ लड्डू खा रहा हो!
एक प्रसंग और याद आ रहा है, पंत जी अस्वस्थ थे और शायद गोल मार्केट के पास कांता भारती जी के फ्लैट में रह रहे थे, मेरे कवि मित्र प्रताप सिंह जी ने कहा कि चलो उनसे मिलकर आते हैं, मैंने कहा कि उनसे मैं क्या बात कर पाऊंगा! इस बात को प्रताप सिंह जी ने अपने कविता संकलन की भूमिका में कुछ अलग अंदाज़ में लिखा था।
खैर मैंने बात भवानी दादा से शुरू की थी और फिर से उन पर ही लेकर आता हूँ। बीच में वरिष्ठ रचनाकारों के प्रसंग मैंने इस आलेख को समुचित आकार प्रदान करने के लिए ही डाल दिए हैं।
हाँ तो भवानी दादा मेरे अत्यंत प्रिय कवियों में से एक हैं। उनका बातचीत के लहज़े में कविता कहने का तरीका अनूठा है। मुझे गायक मुकेश जी भी बहुत पसंद हैं जो लगता है कि अपनी आवाज़ में ही अपना दिल खोलकर रख देते थे और वैसा ही भवानी दादा की कविताओं को पढने या सुनने में लगता है। मैंने भवानी दादा की बहुत सी कविताएं अपने ब्लॉग में शेयर की हैं। बहुत सहज़ तरीके से भवानी दादा बहुत गहरी बात कह देते हैं और उनकी रचना का सबसे महत्वपूर्ण घटक शायद उनका निश्छल मन है।
अब मैं यह भी बता दूं कि भवानी दादा के बारे में लिखने का विचार मेरे मन में क्यों आया। डॉक्टर कुमार विश्वास ने ‘तर्पण’ नाम से कुछ वरिष्ठ कवियों की रचनाओं के वीडिओ, अपने स्वर में तैयार किए हैं जो मैं समझता हूँ कि बहुत अच्छी पहल है, इसी क्रम में भवानी दादा की रचना ‘आज पानी गिर रहा है’ भी शामिल है जिसको मैंने अभी कुछ दिन पहले सुना। इस रचना में भवानी दादा ने दर्शाया है कि वे अपने घर के चार-पांच भाइयो में सबसे छोटे हैं और पर्व के अवसर पर सब लोग पैतृक निवास पर इकट्ठा होते हैं लेकिन वो नहीं जा पाते हैं। ऐसे में दिल्ली में बारिश हो रही है और वे अपने बचपन, अपने परिवार को याद करते हैं। यह जो अनुभव है कविता को वो सुनकर ही महसूस किया जा सकता है, हर पंक्ति में जैसे वो अपने हृदय को खोलकर रख देते हैं। कविता में जब वे कहते हैं ‘हाँ मजे में है भवानी’ तो बरबस आंखों में आंसू आ जाते हैं।
वह कवि जो गीत को बेचना नहीं जीना चाहता है, ‘जी हाँ हुज़ूर मैं गीत बेचता हूँ’।
मैं यही कहूंगा कि कुमार विश्वास जी द्वारा तैयार किया गया यह वीडिओ भवानी दादा को सच्ची श्रद्धांजलि है और इसको सुनना एक अनोखा अनुभव है।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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