माँगता कोई और है!

मैं किसी के दस्त-ए-तलब में हूँ तो किसी के हर्फ़-ए-दुआ में हूँ,
मैं नसीब हूँ किसी और का मुझे माँगता कोई और है|

सलीम कौसर

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