रख़्त-ए-सफ़र में!

है बस-कि ख़ाक उड़ाने की आवारगी को खो,
रख़्त-ए-सफ़र में घर को भी बाँधे फिरा करो|

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

Leave a comment