आरज़ू ही रह गई!

आरज़ू ही रह गई ‘मजरूह’ कहते हम कभी,
इक ग़ज़ल ऐसी जिसे तस्वीर-ए-जानाना कहें|

मजरूह सुल्तानपुरी

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