कामायनी/चिंता-1

एक बार फिर से आज मैं छायावाद युग से एक प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी के महाकाव्य कामायनी के चिंता सर्ग के प्रथम भाग का एक अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ।

प्रसाद जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी के महाकाव्य कामायनी का यह अंश –

हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह
एक पुरुष, भीगे नयनों से, देख रहा था प्रलय प्रवाह।

नीचे जल था ऊपर हिम था, एक तरल था एक सघन,
एक तत्व की ही प्रधानता, कहो उसे जड़ या चेतन।

दूर दूर तक विस्तृत था हिम, स्तब्ध उसी के हृदय समान,
नीरवता-सी शिला-चरण से, टकराता फिरता पवमान।

तरूण तपस्वी-सा वह बैठा, साधन करता सुर-श्मशान,
नीचे प्रलय सिंधु लहरों का, होता था सकरूण अवसान।

उसी तपस्वी-से लंबे थे, देवदारु दो चार खड़े,
हुए हिम-धवल, जैसे पत्थर, बनकर ठिठुरे रहे अड़े।

अवयव की दृढ माँस-पेशियाँ, ऊर्जस्वित था वीर्य्य अपार,
स्फीत शिरायें, स्वस्थ रक्त का, होता था जिनमें संचार।

चिंता-कातर वदन हो रहा, पौरूष जिसमें ओत-प्रोत,
उधर उपेक्षामय यौवन का, बहता भीतर मधुमय स्रोत।

बँधी महावट से नौका थी, सूखे में अब पड़ी रही,
उतर चला था वह जल-प्लावन, और निकलने लगी मही।

निकल रही थी मर्म वेदना, करूणा विकल कहानी सी,
वहाँ अकेली प्रकृति सुन रही, हँसती-सी पहचानी-सी।

“ओ चिंता की पहली रेखा, अरी विश्व-वन की व्याली,
ज्वालामुखी स्फोट के भीषण, प्रथम कंप-सी मतवाली।

हे अभाव की चपल बालिके, री ललाट की खलखेला
हरी-भरी-सी दौड़-धूप, ओ जल-माया की चल-रेखा।

इस ग्रहकक्षा की हलचल- री तरल गरल की लघु-लहरी,
जरा अमर-जीवन की, और न कुछ सुनने वाली, बहरी।

अरी व्याधि की सूत्र-धारिणी- अरी आधि, मधुमय अभिशाप
हृदय-गगन में धूमकेतु-सी, पुण्य-सृष्टि में सुंदर पाप।

मनन करावेगी तू कितना? उस निश्चित जाति का जीव
अमर मरेगा क्या? तू कितनी गहरी डाल रही है नींव।

आह घिरेगी हृदय-लहलहे, खेतों पर करका-घन-सी,
छिपी रहेगी अंतरतम में, सब के तू निगूढ धन-सी।

बुद्धि, मनीषा, मति, आशा, चिंता तेरे हैं कितने नाम
अरी पाप है तू, जा, चल जा, यहाँ नहीं कुछ तेरा काम।

विस्मृति आ, अवसाद घेर ले, नीरवते बस चुप कर दे,
चेतनता चल जा, जड़ता से, आज शून्य मेरा भर दे।”

“चिंता करता हूँ मैं जितनी, उस अतीत की, उस सुख की,
उतनी ही अनंत में बनती जात, रेखायें दुख की।

आह सर्ग के अग्रदूत, तुम असफल हुए, विलीन हुए,
भक्षक या रक्षक जो समझो, केवल अपने मीन हुए।

अरी आँधियों ओ बिजली की, दिवा-रात्रि तेरा नर्तन,
उसी वासना की उपासना, वह तेरा प्रत्यावर्तन।

मणि-दीपों के अंधकारमय, अरे निराशा पूर्ण भविष्य
देव-दंभ के महामेध में, सब कुछ ही बन गया हविष्य।

अरे अमरता के चमकीले पुतलो, तेरे ये जयनाद
काँप रहे हैं आज प्रतिध्वनि, बन कर मानो दीन विषाद।

प्रकृति रही दुर्जेय, पराजित, हम सब थे भूले मद में,
भोले थे, हाँ तिरते केवल सब, विलासिता के नद में।

वे सब डूबे, डूबा उनका विभव, बन गया पारावार
उमड़ रहा था देव-सुखों पर, दुख-जलधि का नाद अपार।”

“वह उन्मुक्त विलास हुआ क्या, स्वप्न रहा या छलना थी
देवसृष्टि की सुख-विभावरी, ताराओं की कलना थी।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

                            ********  

3 responses to “कामायनी/चिंता-1”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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