आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|
शलभ जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की यह कविता –

कौन ले जा रहा है मनुष्य को
सामूहिक आत्मघात की दिशा में बिला झिझक?
सभ्यता को
ध्वंसावशेषों के हवाले करना चाहता है कौन?
भाषाओँ को
हथियारों में ढाल रहा है कौन?
कौन प्रक्षेपास्त्रों में तब्दील कर रहा है
संस्कृतियों को?
जीवन-शैलियों को
साम्प्रदायिकता के हलाहल का रूप दे रहा है कौन?
विज्ञान के
विनाशकारी उपयोग का
सपना देखने वाला कौन है सत्ताओं के सिवा
इस दुनिया में?
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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