सर झुकाए गुज़र गया!

वो जिस के शाने पे हाथ रख कर सफ़र किया तू ने मंज़िलों का,
तिरी गली से न जाने क्यूँ आज सर झुकाए गुज़र गया वो|

नासिर काज़मी

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