बहुत से शे’र मुझ से!

बहुत से शेर मुझ से ख़ून थुकवाते हैं आमद पर,

बहुत मुमकिन है मैं एक दिन ग़ज़ल-ख़्वानी से मर जाऊँ|

महशर आफ़रीदी

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