यही तो है फ़र्क़ मुझ!

बस एक मंज़िल है बुल-हवस की हज़ार रस्ते हैं अहल-ए-दिल के,
यही तो है फ़र्क़ मुझ में उस में गुज़र गया मैं ठहर गया वो|

नासिर काज़मी

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