ख़ुशी की रुत हो कि!

ख़ुशी की रुत हो कि ग़म का मौसम नज़र उसे ढूँडती है हर दम,
वो बू-ए-गुल था कि नग़्मा-ए-जाँ मिरे तो दिल में उतर गया वो|

नासिर काज़मी

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