शब्‍द बच्‍चों की तरह!

आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि श्री लीलाधर मंडलोई जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ।

मंडलोई जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री लीलाधर मंडलोई जी की यह कविता –


मेरे भीतर कोमल शब्‍दों की एक डायरी होगी जरूर
मेरी कविता में स्त्रि‍यां बहुत हैं
मेरा मन स्‍त्री की तरह कोमल है
मुझसे संभव नहीं कठोरता
मैं नर्मगुदाज शब्‍दों से ढंका हूं
अगर सूरज भी हूं तो एकदम भोर का
और नमस्‍कार करता हूं अब भी झुककर

मैं न पूरी वर्णमाला याद रख पाता हूं
न व्‍याकरण
हर बार लौटता हूं और भूला हुआ याद आता है
ठोक-पीटकर जो गढ़ते हैं शब्‍द
मैं उनमें से नहीं हूं

मेरे भीतर शब्‍द बच्‍चों की तरह बड़े होते हैं
अपना-अपना घर बनाते हैं
कुछ गुस्‍से में छोड़कर घर से बाहर निकल जाते हैं
मुझे उनकी शैतानियों से कोफ्त नहीं होती
मैं उन्‍हें करता हूं प्‍यार

लौट आने के इंतजार में मेरी दोस्‍ती
कुछ और नए बच्‍चों से हो जाती है
घर छोड़कर गए शब्‍द जब युवा होके लौटते हैं
मैं अपने सफेद बालों से उन्‍हें खेलते देख
एक सुरमई भाषा को बनते हुए देखता हूं

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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3 responses to “शब्‍द बच्‍चों की तरह!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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