थी हर एक बात में!

थी हर एक बात में चाशनी हक़-ओ-सिद्क़-ओ-लुत्फ़-ओ-ख़ुलूस की,
रह-ए-हक़ पे चलना शिआ’र था तुम्हें याद हो कि न याद हो|

अर्श मलसियानी

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