ज़िंदगी पे निखार था!

थीं बहम नशात की महफ़िलें थीं क़दम में लुत्फ़ की मंज़िलें,
बड़ा ज़िंदगी पे निखार था तुम्हें याद हो कि न याद हो|

अर्श मलसियानी

Leave a comment