कंगन दिलाने के लिए!

मैं ‘ज़फ़र’ ता-ज़िंदगी बिकता रहा परदेस में,
अपनी घर-वाली को इक कंगन दिलाने के लिए|

ज़फ़र गोरखपुरी

Leave a comment