आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय भारत भूषण अग्रवाल जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ।
इनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत भूषण अग्रवाल जी की यह कविता –

बीच-बीच की
ये मुलाक़ातें
मेरी उम्र के पन्नों पर ऐसे ही सजी हैं
जैसे बच्चे अपनी पोथी में
चमकीली पन्नी
साँप की केंचुल
और फूल की पँखुरियाँ रखते हैं ।
प्यार ?
सच क्या वह ललक ही प्यार है ?
तो फिर उसको क्या कहते हैं
जो अनजाने अँधेरे में
भीतरी तहों में पहुँच जाता है
और हरेक छिद्र को रस में भर देता है ।
इस बार मिलोगी तो पूछूँगा !
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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