आज मैं श्रेष्ठ नवगीत कवि श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ।
मिश्र जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत–

आँगन का पंछी चढ़ा मुड़ेरे पर
जंगल को अपना घर बतलाता है
कुछ ऐसी हवा बही ज़हरीली-सी
सारा का सारा युग हकलाता है ।
रोपना हमारा बिरवा तुलसी का
फूटी आँखों भी उसे नहीं भाता
जब भी दरवाज़ा सूना पाता वह
आकर सारी पत्तियाँ कुतर जाता
क्षत-विक्षत कर पंजों से वह अपने
दर्पण की सत्ता को झुठलाता है ।
इस घर के सूरज की हो यही नियति
पाँखें जमते ही नीड़ छोड़ जाना
फिर जाने किस बेचारेपन से घिर
पश्चिमी क्षितिज से लौट नहीं पाना
जाने कैसी यह नज़र लगी उसको
बेहोशी में गाता-चिल्लाता है ।
जब इंद्रधनुष झुककर माथा चूमे
तलवे धो जाएँ सागर की लहरें
जब शंख जगाए सुबह-सुबह हमको
बतलाओ कैसे हो जाएँ बहरे
जीवन के व्याकरणों को दफ़नाकर
भाषा के भ्रम में वह तुतलाता है ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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