आज मैं हिंदी के विख्यात कवि स्वर्गीय श्री नेमिचंद्र जैन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ।
इनकी अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री नेमिचंद्र जैन जी की यह कविता–

क्या भाया ?
अनजाने मन क्यों इस कोलाहल में खिंच कर बह आया ?
वे वन की संध्याएँ निर्जन
मदिर-अरुण पीली
भोली-सी नीली
सूना निर्झर-तीर,
कहीं से मौलसिरी का परिमल उन्मन
लाया सिहराता समीर–
भर लाया ।
नन्हीं चिड़ियों का कलरव सुन
पूछ-पूछ उठता था तब मन
क्या गाया–
भोली चिड़ियों ने क्या गाया ?
ये उलझे आवरण यहाँ के
बन्धन की काया
झूठी जीवन की परिभाषा
रीते-से आडम्बर की ओछी-सी अभिलाषा–
इस कोलाहल के अंचल में आ कर क्या पाया ?
क्या पाया?
क्यों मन खिंच कर बह आया ?
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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