इक नज़र भी तिरी काफ़ी थी प-ए-राहत-ए-जाँ,
कुछ भी दुश्वार न था मुझ को शकेबा करना।
हसरत मोहानी
A sky full of cotton beads like clouds
इक नज़र भी तिरी काफ़ी थी प-ए-राहत-ए-जाँ,
कुछ भी दुश्वार न था मुझ को शकेबा करना।
हसरत मोहानी
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