अनुरक्ति!

आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ।

दुष्यंत जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। दुष्यंत जी आपातकाल में लिखे गए ‘साये में धूप’ नामक अपने ग़ज़ल संग्रह से विशेष रूप से विख्यात हुए थे।

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की यह कविता –



जब जब श्लथ मस्तक उठाऊँगा
इसी विह्वलता से गाऊँगा।

इस जन्म की सीमा-रेखा से लेकर
बाल-रवि के दूसरे उदय तक
हतप्रभ आँखों के इसी दायरे में खींच लाना
तुम्हें मैं बार बार चाहूँगा!

सुख का होता स्खलन
दुख का नहीं,
अधर पुष्प होते होंगे—
गंध-हीन, निष्प्रभाव, छूछे….खोखले….अश्रु नहीं;
गेय मेरा रहेगा यही गर्व;
युग-युगांतरों तक मैं तो
इन्हीं शब्दों में कराहूँगा।
कैसे बतलाऊँ तुम्हें प्राण!
छूटा हूँ तुमसे तो क्या?
वाण छोड़ा हुआ
भटका नहीं करता!
लगूँगा किसी तट तो—
कहीं तो कचोटूँगा!
ठहरूँगा जहाँ भी—प्रतिध्वनि जगाऊँगा।

तुम्हें मैं बार बार चाहूँगा!


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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