कोई और छाँव देखेंगे!

आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय ताराप्रकाश जोशी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ।

ताराप्रकाश जोशी जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ताराप्रकाश जोशी जी की यह कविता –


कोई और छाँव देखेंगे
लाभों घाटों की नगरी तज
चल दें, और गाँव देखेंगे ।

सुबह सुबह के
सपने लेकर, हाटों हाटों खाए फेरे
ज्यों कोई भोला बंजारा पहुँचे कहीं ठगों के डेरे ।
इस मण्डी में ओछे सौदे, कोई और
भाव देखेंगे ।

भरी दुपहरी
गाँठ गँवाई, जिससे पूछा बात बनाई
जैसी किसी गाँव वासी की महानगर ने हँसी उड़ाई ।
ठौर ठिकाने विष के दागे, कोई और
ठाँव देखेंगे ।

दिन ढल गया
उठ गया मेला, ख़ाली रहा उम्र का ठेला
ज्यों पुतलीघर के पर्दे पर खेला रह जाए अनखेला ।
हार गए यह जनम जुए में, कोई और
दाँव देखेंगे ।

किसे बताएँ
इतनी पीड़ा, किसने मन आँगन में बोई
मोती के व्यापारी को क्या, सीप उम्रभर कितना रोई ।
मन के गोताख़ोर मिलेंगे, कोई और
नाव देखेंगे ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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