बहिश्त ऐसी!

जहाँ रिफ़ाक़त हो फ़ित्ना-पर्दाज़ मौलवी की,
बहिश्त ऐसी किसी को मेरे ख़ुदा न देना|

क़तील शिफ़ाई

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