फ़ुर्सत जिन्हें अब!

कल यूँ था कि ये क़ैद-ए-ज़मानी से थे बेज़ार,
फ़ुर्सत जिन्हें अब सैर-ए-मकानी से नहीं है|

शहरयार

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